बारिश की वो आखिरी मुलाक़ात
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बारिश... वो मौसम जो हर कहानी को थोड़ा और गहरा कर देता है। लेकिन उस दिन की बारिश कुछ अलग थी—अधूरी सी, जैसे किसी आखिरी मुलाक़ात का बदला हुआ मौसम।
स्टेशन की पुरानी छत से पानी टप-टप नीचे गिर रहा था और मैं वहीँ खड़ा उसे देख रहा था— अनाया। वही मुस्कान, वही नज़रें, वही हल्की-सी घबराहट… और उसी बारिश जैसी खामोशियाँ।
मैंने बस सिर हिलाकर 'हाँ' कहा। क्योंकि उस वक्त शब्द नहीं, सिर्फ पल मायने रखता था।
हम दोनों उसी पुराने कॉफी kiosk के पास जाकर खड़े हो गए जहाँ कभी हमने मॉनसून में हाथों की उंगलियाँ छुपाकर पकड़ी थीं। अजीब है… कुछ जगहें कभी पुरानी नहीं होतीं।
उसकी आँखों की बारिश
उसने धीरे से कहा— “शायद ये हमारी आखिरी मुलाक़ात है…” और उसके कहने से पहले ही मैंने समझ लिया था। हम दोनों के रास्ते बदल चुके थे—पर यादें नहीं।
हवा में ठंडक बढ़ रही थी और उसकी आँखें भीग चुकी थीं। ये बारिश आसमान की ज़्यादा थी या उसकी आँखों की… कोई फर्क नहीं पता चल रहा था।
मैंने मुस्कुराकर सिर्फ इतना कहा— “उसी तरह मुस्कुराऊँगा… जैसे आज।”strong>
बारिश की एक तेज़ लहर आई, उसने अपनी दुपट्टे से मेरे हाथ पोंछे— और उसी पल मुझे अहसास हुआ कि कुछ स्पर्श सिर्फ यादों में ही अच्छे लगते हैं।
ट्रेन, बारिश और आखिरी अलविदा
उसकी ट्रेन आने की घोषणा हुई। वो धीरे-धीरे पीछे हट गई… जैसे हर कदम के साथ खुद को समझा रही हो कि “ये सही फैसला है।”
मैंने उसे जाते हुए देखा… बारिश में उसकी परछाईं धुंधली पड़ती गई — और आखिरी प्लेटफॉर्म पर खड़े होकर मुझे महसूस हुआ कि कुछ लोग जाते नहीं… बस कहानी बदल जाती है।
ट्रेन चल दी। लेकिन उसकी वो मुस्कान… अब भी वहीं थी — मेरे दिल के स्टेशन पर, उसी आखिरी बारिश की तरह।
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